महिला दिवस

mahila diwas के लिए इमेज नतीजे

यूँ तो भारत में राष्ट्रीय महिला दिवस बारह फरवरी को मनाया जाता है| मगर अंतराष्ट्रीय महिला दिवस की धूम ज्यादा है|

दरअसल अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस एक मज़दूर आंदोलन से उपजा है. इसका बीजारोपण साल 1908 में हुआ था जब 15 हज़ार औरतों ने न्यूयॉर्क शहर में मार्च निकालकर नौकरी में कम घंटों की मांग की थी.

इसके अलावा उनकी मांग थी कि उन्हें बेहतर वेतन दिया जाए और मतदान करने का अधिकार भी दिया जाए. एक साल बाद सोशलिस्ट पार्टी ऑफ़ अमरीका ने इस दिन को पहला राष्ट्रीय महिला दिवस घोषित कर दिया.

जिसके बाद महिलाओ को शसक्त बनाने की दिशा में और भी बहुत से कार्य हुए.

लेकिन भारत में सरोजिनी नायडू के जन्मदिन को हर साल 13 फरवरी को भारत के राष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मानते है  उन्हें भारत की पहली महिला राज्यपाल बनने का गौरव प्राप्त है वो एक बहुत ही अच्छी लेखिका थी

उनकी  कुछ महवत्पूर्ण रचनाए है

1905 में प्रकाशित गोल्डन थ्रेशोल्ड उनकी कविताओं का पहला संग्रह
: द बर्ड ऑफ़ टाइम: लाइक्स ऑफ़ डेथ, डेथ एंड द स्प्रिंग
• फेस्ट ऑफ़ यूथ
• द मैजिक ट्री
• द विजार्ड मास्क
: मुहम्मद जिन्ना: एन एम्बेसेडर यूनिटी
• द सेप्ट्रेड फ्लूट: सोंग्स ऑफ इंडिया, इलाहाबाद: किताबीस्तान
• द इंडियन वीवर्स

उनकी सबसे पहली रचना जिसे हम सबमे से बहोतो ने स्कूल में पढ़ी होंगी द बैंगल सेलर

कुल मिलाकर वो एक ऐसी महिला थीं जिन्हे आदर्श मन जाता है|

आप सभी को महिला दिवस की शुभकामनाए|

अप्सरा का श्राप

वैसे पढ़ने को तो मैं बहुत कुछ पढ़ता हूँ। कभी सौख से तो कभी कुछ अच्छा सीखने के लिए| मगर कभी कभी कुछ ऐसा पढ़ लेता हूँ,  जिसे पढ़ने के बाद मन कहता है और ये कभी ख़तम ही न हो बस मै ऐसे ही पढ़ते रहूं। ये किताब भी मुझे कुछ ऐसी ही लगी. इसे मैंने लिया  तो था, फुटपाथ से लेकिन इसके शब्द ऐसे है मानो मैं खुद वहां मौजूद हूँ जहाँ ये सब घटित हो रहा है|

जो किताब मैंने ली थी उसमे तो लेखक के बारे में कुछ  नहीं  था लेकिन मैंने यशपाल जी के बारे में बहुत सुना था और पढ़ा था अखबारों में और अलग अलग जगहों पर उनकी ये कृति अद्भुत ही नहीं बल्कि उनके व्यक्तित्व का परिचय भी देती है के वो एक अद्भुत इंसान रहे होंगे ये मेरा सोचना है|

वैसे उनकी सभी लिखी हुई चीजों में से मुझे फूलों का कुरता वो पहली कहानी है जो मैंने पढ़ी और उसकी जैसी कोई चीज किसी अलग लेखक से नहीं मिली।  ❤❤yashpal-hindi-writer-s_650_120314023502

 

इश्क़ = सौदा-ए -नाकाफ़ी

इश्क़ है हुजूर ये सौदा ए नाकाफी है,
है बहार इसमें तो ग़म भी काफी है,
तस्दीक से करना ओ मजनूं
मदहोश ख्याली इसमें फ़ना हो जाते है

नैना निराले

होरी तेरे नैना निराले,

नैनन पे जरा कारी काजल लगा ले।

होठो पे जरा लाली लगाले,

गोरी तेरे नैना निराले।

तेरे नैनो के सागर में नाचे मेरे प्रेम की नैया
हौले हौले यो ही चलती रहे पवन पुरवाइआ
होंठो से पिला जरा प्रेम रस प्याले
होरी तेरे नैना निराले।

तेरी आहिस्ता आवाज हौले आघात करे
तेरी वो प्यारी सी हसी हर वक्त मुझे हमसाज करे
तेरी वो यादें जिसे हर वक्त हम गले से लागले
होरी तेरे नैना निराले।

तुझे देख मन में छाए बादल काले
जो देखे एक बार तुझे मन में बसाले।
तेरे वो धारदार नैना उसे मार ही डाले
होरी गोरी तेरे नैना निराले।

taruf itna dekar

तमन्ना छोड़ देते हैं… इरादा छोड़ देते हैं,
चलो एक दूसरे को फिर से आधा छोड़ देते हैं।

उधर आँखों में मंज़र आज भी वैसे का वैसा है,
इधर हम भी निगाहों को तरसता छोड़ देते हैं।

हमीं ने अपनी आँखों से समन्दर तक निचोड़े हैं,
हमीं अब आजकल दरिया को प्यासा छोड़ देते हैं।

हमारा क़त्ल होता है, मोहब्बत की कहानी में,
या यूँ कह लो कि हम क़ातिल को ज़िंदा छोड़ देते हैं।

हमीं शायर हैं, हम ही तो ग़ज़ल के शाहजादे हैं,
तआरुफ़ इतना देकर बाक़ी मिसरा छोड़ देते हैं।

I don’t know who writes this but its beautiful and interesting

उनसे पूछे

पूछे कोई शाम से या श्याम से पूछे

या मेरे प्रिय उस कमल नयन  राम से पूछे

हूं कौन मैं कोई उनसे मेरा नाम तो पूछे ।

पूछ रहा तो यह भी पूछे कि मनुज का सार क्या है

पूछ रहा तो यह भी पूछे कि मन का अंधकार क्या है।

है क्या यह तमस संसार क्या है

पूछना है तो यह भी पूछे कि क्या है अरमान सितारों के

सूरज के अंबर के तुम्हारे।

रश्मिरथी

मुसीबत को जो नही झेल सकता,

निराशा से जो नहीं खेल सकता।

पुरुष क्या श्रृंखला को तोड़ करके,

चले आगे नहीं जो जोर करके?

दिनकर जी के ये शब्द न जाने कैसे किसे बदल दे और न जाने कैसे महसूस करने वालो के हृदय में अग्नि भर देते हैं।

🙏 उन्हें जो हमेशा कुछ अच्छा कर आगे बढ़ने की ऊर्जा देते है।

उठा के कलम

उठा के कलम मैं अब अपना इंतकाम लिखूंगा।

खो दिया जिन लम्हों को अब उन लम्हों को एक पैगाम लिखूंगा।

समय के पन्नों पर अब मैं अपना कलाम लिखूंगा।

छिपे हुए इस जहान में हर एक रूह को मैं अपना सलाम लिखूंगा।

न अंधेरों की ताकत मुझे रोक पाएगी ना उजालों का खौफ मुझे सताएगा

जब तलक रहेगी कलम हाथ में न कोई मुझे रोक पाएगा।

गिरूंगा और उठूंगा लेकिन हर एक कड़वा कलाम लिखूंगा।

इंकलाब

रहगुजर हूं मैं हर एक इंकलाब का,

इंतकाम हर एक दिल नशी ख्वाब का

झुठला सके ना सच भी जिसे

मुहाना हूं मैं उस दुआब का।

यूं तो तूफान में कश्ती भी डगमगा जाती है,

डूब कर जो नूतन लौटाए,

मसीहा हूं मैं उस सैलाब का, समंदर का, इंकलाब का।

कम मिलता है

चाहने से कहा खुशी मिलती है,

गम मिलता है बस थोड़ा कम मिलता है।

हू सोचता कर लूं हर शमा हंसी

पर अब कहा दम मिलता है।

लुटाने बैठा हूं हर गम तबीयत से बोल कर

मगर जाउं जिधर बस तम मिलता है।

बस अब करता हू इबादत उस रब से

छोटी छोटी खुशियों में खुश रहना सीखा दे,

क्योंकि उनके बगैर कहा हौसला- ए – दम मिलता है।

क्या है

मंजिल क्या है, रास्ता क्या है,
सुनो सफ़र की दास्ताँ क्या है…

मैं अकेला ही चलता रहा,
यादों के आगे काफिला क्या हैं…

ये पत्थर, ये मूरत,ये खुदा क्या है,
कभी हमसे मिलो तो जानो वफा क्या है…

तू गैर की हो गई ज़रा भी रंज नहीं,
इश्क़ का हुस्न से मुकाबला क्या है…

यूँ ही खामोश रहते हो सदा,
जिंदगी से कोई फैसला क्या है…

तेरे दिल के कोने में जगह मिल जाये,
फिर ये गली ये मोहल्ला क्या है…

यादों की भीड़ में गुम हो जाता हूँ,
की तन्हाई के आगे मेला क्या है…

मौत के आगोश में मोहब्बत हैं मेरी,
जिंदगी से बढ़कर बेवफ़ा क्या है…

शमशान हूं

ओ माया से विस्मित तमा में डूबा हुआ

क्यों घबराता है मुझसे मैं ही असली हूं हीरे की खान हूं

हां मैं श्मशान हूं।

कर भ्रमण, चिंतन कर, जीवन रथ पर सवार
पाले मुक्ति हर भ्रम से जो जीवन मोह भस्म कर दे
मैं वह सुलझे हुए सच के समान हूं,

हां मैं श्मशान हूं।

खामोश


घिरा हूं मची है भगदड़ संभलने का ना होश है,

लेकिन कुछ है कि जिंदगी खामोश है।

मिलता हूं हंसता हूं कहते हैं जीने का जोश है,

मगर जिंदगी खामोश है।

जैसे ठंड में सुबह पत्ते पर ठहरी हुई ओस है

या शायद दस्तक देने से पहले हर एक तूफा रहता खामोश है।

Bewaqt

स्याह नदी जो सारे ख्वाब ले डूबी

जागी तो किनारे सो गए, वह तो ख्वाब हमारे तैरना जानते थे।

हालात से बेपरवाह•••••••••••••••••••••

ललकार

सरफरोश नहीं जमाने में,

सब होश खोए बैठे हैं

डूबा कोई गफलत में

तो कोई भटका का शिकार है।

बेफिक्री में

भूलकर

सो चुके हैं शेर ए हिंद उन्हें अब मेरी ललकार है।

वीर की वीरांगना

मैं उस वीर की वीरांगना हूं,

जिसने देश के लिए सर कटाये दुश्मन अगर सर उठाए तो आंखें देख कर भाग जाए।

कश्मीर हो या राजस्थान जिसने लड़कर बचाया भारत का सम्मान,

किया जिसने भारत का उत्थान, जिसने देश की प्रगति में हाथ बटाएं,

मैं उसे वीर की वीरांगना हूँ जिसने देश के लिए सर कटाये।

पूस की रात हो या और कोई बात हो,

जो सदा देश के साथ हो,

जो अदम्य साहस का परिचय कराएं,

जो अपने घर से पहले दूसरों का घर बचाए,

मैं उस वीर की वीरांगना हूं जिसने देश के लिए सर कटाये।

जब हो आतंक से सामना, साहस को उन्हें है थामना, ना हो किसी की कामना,

जो लड़कर मौत से टकराए,

मैं उस वीर की वीरांगना हूं जिसने देश के लिए सर कटाये।

स्वाभिमान की ऐसी आग, जो करदे दुश्मन को दाग दाग जो देश का मनोबल बढ़ाये,

जो सम्मान का अनुभव कराएं,

मैं उस वीर की वीरांगना हूँ, जिसने देश के लिए सर कटाये।

💐निशांत

अब हम आजाद हैं🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳

देश की स्वतंत्रता के लिए क़ुर्बान हुए अनगिनत जांबाज़ हैं,

कर्ज उतारा उन्होंने मातृ वतन का और अब हम आजाद हैं।

साधु जी, सारे जवार के लोग इस नाम और शख्सियत से भलीभांति वाकिफ थे। वाकिफ इतने कि कोई भी सरकारी काम चाहे कचहरी का हो या कोई और सभी बड़े सेठ महाजन लोग इन से मशवरा लेने आते थे। दिनभर इनके चौखट पर मश्वरा लेनेवाले लोगों और सरपंचों का जमावड़ा लगा रहता था। इनका जीवन भी किसी रंगमंच के नाटक से कम नहीं था। ना तो ये किसी साहूकार के पुत्र थे, ना जमींदार के पोते, उनका लालन-पालन एक साधारण ब्राह्मण के घर में हुआ था जब 10 वर्ष के हुए तो इनके पिताजी वैरागी हो गए और उनकी माता जी का देहांत उनके जन्म के तीसरे साल ही हो गया था सो इनकी कोई देख-रेख करने वाला नहीं था। इनके पिता जी ने इनकी देखरेख की थी। जाते-जाते बैरागी जी ने इन्हें अपने परम मित्र जो इनके मौसा थे को सौंप दिया।

यह वही साल था जब मंगल पांडे ने अंग्रेजो के खिलाफ बगावत की थी। जब यह 16 वर्ष के हुए तो सौभाग्यवश इनकी मुलाकात एक दुभाषिया से हुई जो ब्रिटिश सेना में कार्यरत था। कुछ ही दिनों में ये उनसे इतने प्रभावित हुए कि इन्होंने सरकारी आदमी बनने की ठान ली। मगर उनके व्यक्तित्व से ज्यादा इन्हें उनके कोट पेंट ने प्रभावित किया था। साधु जी ठहरे साधु जी जो ठान ली वो ठान ली, बन बैठे सरकारी आदमी नौकरी क्लर्क की मिली थी, अंग्रेजी दफ्तर में। भत्ता भी अच्छा खासा था। कुछ ही सालों में उन्होंने सारे महकमे में अपनी गहरी पैठ बना ली। एक बार एक बड़े साहब निरीक्षण के लिए इनके महकमे में पधारे, फिर दूसरी बार आएं और हर साल आते गए। कई बार तो साधु जी के काम से वह बड़े प्रभावित हुए और अंत मे इन्हें अपना सेक्रेटरी बना लिया।

जिस दिन इनके काम का पहला दिन था उसी दिन दुर्भाग्यवश स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद जी ने देश के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। यह दफ्तर में बैठे थे,साहब भी आए ये उन्हें कोई कागज दिखा रहे थे। तभी कोई चिल्लाया आजाद जी नहीं रहे साहब धूर्ततापूर्ण मुस्कान लिए बुदबुदाया और बोले और मांगो आजादी सहसा साधु जी चिल्लाते हुए बोले “अब हम आजाद हैं” और लात घूसों की बरसात कर दी साहब पर तभी इनका दफ्तर छूटा और इनकी आजादी भी छूट गई जेल गए सो अलग।

पूरे जिले में इस कांड की चर्चा हो गई, लगा जिले को एक नया क्रांतिकारी मिल गया, हुआ भी वही अब इन पर आजादी की सनक सवार हुई। सनक ऐसी कि साल के आठों माह जेल में ही बिताने लगे। बाकी चार महीने लोगों को जागरुक करने उन पर देश भक्ति का रंग चढ़ाने और जगह-जगह क्रांतिकारी सभाओं को संबोधित करने में बिताने लगे।

जब जब कोई देशव्यापी स्वतंत्रता के लिए आंदोलन हुआ उन्होंने अपने राज्य और जिले में उसकी अगुवाई की। इसी सनक में ये ब्रह्मचारी बन बैठे, प्रण लिया जब तलक आजादी नहीं मिलेगी ब्याह नही करेंगे। सो तभी इन्हें नाम मिला साधु जी फिर बुढ़ापे ने उन्हें जकड़ लिया फिर भी मशवरा लेने वालों की तादाद कभी कम नहीं हुई। फिर आया वह वर्ष जब भारत आजाद होने वाला था, लेकिन जब तक आजाद होता,ये आजाद हो चले थे।

मेरी तरफ से आप सभी को स्वतंत्रता दिवस के लिए हार्दिक शुभकामनाएं।🌄🙏

चलो फ़िर से मुस्कुराएं

चलो फिर से मुस्कुराएं
चलो फिर से दिल जलाएं
जो गुज़र गयी हैं रातें
उन्हें फिर जगा के लाएं
जो बिसर गयी हैं बातें
उन्हें याद में बुलायें
चलो फिर से दिल लगायें
चलो फिर से मुस्कुराएं
किसी शह-नशीं पे झलकी
वो धनक किसी क़बा की
किसी रग में कसमसाई
वो कसक किसी अदा की
कोई हर्फे-बे-मुरव्वत
किसी कुंजे-लब से फूटा
वो छनक के शीशा-ए-दिल
तहे-बाम फिर से टूटा
ये मिलन की, नामिलन की
ये लगन की और जलन की
जो सही हैं वारदातें
जो गुज़र गयी हैं रातें
जो बिसर गयी हैं बातें
कोई इनकी धुन बनाएं
कोई इनका गीत गाएं
चलो फिर से मुस्कुराएं
चलो फिर से दिल लगाएं

फ़ैज़ अहमद

Love wid work

वो लोग बहुत ख़ुशक़िस्मत थे
जो इश्क़ को काम समझते थे
या काम से आशिक़ी करते थे
हम जीते जी मसरूफ़ रहे
कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया

काम इश्क़ के आड़े आता रहा
और इश्क़ से काम उलझता रहा
फिर आख़िर तंग आकर हम ने
दोनों को अधूरा छोड़ दिया

In memory of

Faizz Ahmad faizz 😶

बनाया है मैंने ये घर धीरे धीरे

बनाया है मैंने ये घर धीरे धीरे

खुले मेरे ख्वाबों के पर धीरे-धीरे

किसी को गिराया ना खुद को उछाला

कटा जिंदगी का सफर धीरे धीरे

जहां आप पहुंचे छलांग लगाकर

मैं भी आया मगर धीरे-धीरे

पहाड़ों की कोई चुनौती नहीं थी

उठता गया यूं ही सर धीरे-धीरे

ना हंसकर रोकर किसी में उड़ेला

पिया खुद ही अपना जहर धीरे-धीरे

गिरा मैं कहीं तो अकेले में रोया

गया दर्द से घाव भर धीरे-धीरे

जमीन खेत की साथ लेकर चला था

उगा उसमें कोई शहर धीरे धीरे

मिला क्या ना मुझको यह दुनिया तुम्हारी मोहब्बत मिली मगर धीरे-धीरे.

By

ramdasarath mishra

वेदना

खंडित विखंडित एहसास

लहू समन्वय शिथिल ह्रदय, मानस प्रवृत्ति का ह्रास।

हर क्षण नया द्वंद आचरण का अराजक खास।

चाहिए आत्मबोध, अदृश्य मित्र तलक अंतिम श्वास।

खोजता उस गगन को जो करें आनीक तम का नाश,

प्रशस्त करें करुणा-कर है पूरा विश्वास।

कमाल

मेहनत का रंग कमाल है प्यारे

उद्घोष वचनबद्ध कर्म सहारे अमरदीप बन जले सितारे

स्वप्न सलिल छोड़ कर्मठ बन अगन जला रे

मेहनत का रंग कमाल है प्यारे।