शमशान हूं

ओ माया से विस्मित तमा में डूबा हुआ

क्यों घबराता है मुझसे मैं ही असली हूं हीरे की खान हूं

हां मैं श्मशान हूं।

कर भ्रमण, चिंतन कर, जीवन रथ पर सवार
पाले मुक्ति हर भ्रम से जो जीवन मोह भस्म कर दे
मैं वह सुलझे हुए सच के समान हूं,

हां मैं श्मशान हूं।

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खामोश


घिरा हूं मची है भगदड़ संभलने का ना होश है,

लेकिन कुछ है कि जिंदगी खामोश है।

मिलता हूं हंसता हूं कहते हैं जीने का जोश है,

मगर जिंदगी खामोश है।

जैसे ठंड में सुबह पत्ते पर ठहरी हुई ओस है

या शायद दस्तक देने से पहले हर एक तूफा रहता खामोश है।

Bewaqt

स्याह नदी जो सारे ख्वाब ले डूबी

जागी तो किनारे सो गए, वह तो ख्वाब हमारे तैरना जानते थे।

हालात से बेपरवाह•••••••••••••••••••••

ललकार

सरफरोश नहीं जमाने में,

सब होश खोए बैठे हैं

डूबा कोई गफलत में

तो कोई भटका का शिकार है।

बेफिक्री में

भूलकर

सो चुके हैं शेर ए हिंद उन्हें अब मेरी ललकार है।

वीर की वीरांगना

मैं उस वीर की वीरांगना हूं,

जिसने देश के लिए सर कटाये दुश्मन अगर सर उठाए तो आंखें देख कर भाग जाए।

कश्मीर हो या राजस्थान जिसने लड़कर बचाया भारत का सम्मान,

किया जिसने भारत का उत्थान, जिसने देश की प्रगति में हाथ बटाएं,

मैं उसे वीर की वीरांगना हूँ जिसने देश के लिए सर कटाये।

पूस की रात हो या और कोई बात हो,

जो सदा देश के साथ हो,

जो अदम्य साहस का परिचय कराएं,

जो अपने घर से पहले दूसरों का घर बचाए,

मैं उस वीर की वीरांगना हूं जिसने देश के लिए सर कटाये।

जब हो आतंक से सामना, साहस को उन्हें है थामना, ना हो किसी की कामना,

जो लड़कर मौत से टकराए,

मैं उस वीर की वीरांगना हूं जिसने देश के लिए सर कटाये।

स्वाभिमान की ऐसी आग, जो करदे दुश्मन को दाग दाग जो देश का मनोबल बढ़ाये,

जो सम्मान का अनुभव कराएं,

मैं उस वीर की वीरांगना हूँ, जिसने देश के लिए सर कटाये।

💐निशांत

अब हम आजाद हैं🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳

देश की स्वतंत्रता के लिए क़ुर्बान हुए अनगिनत जांबाज़ हैं,

कर्ज उतारा उन्होंने मातृ वतन का और अब हम आजाद हैं।

साधु जी, सारे जवार के लोग इस नाम और शख्सियत से भलीभांति वाकिफ थे। वाकिफ इतने कि कोई भी सरकारी काम चाहे कचहरी का हो या कोई और सभी बड़े सेठ महाजन लोग इन से मशवरा लेने आते थे। दिनभर इनके चौखट पर मश्वरा लेनेवाले लोगों और सरपंचों का जमावड़ा लगा रहता था। इनका जीवन भी किसी रंगमंच के नाटक से कम नहीं था। ना तो ये किसी साहूकार के पुत्र थे, ना जमींदार के पोते, उनका लालन-पालन एक साधारण ब्राह्मण के घर में हुआ था जब 10 वर्ष के हुए तो इनके पिताजी वैरागी हो गए और उनकी माता जी का देहांत उनके जन्म के तीसरे साल ही हो गया था सो इनकी कोई देख-रेख करने वाला नहीं था। इनके पिता जी ने इनकी देखरेख की थी। जाते-जाते बैरागी जी ने इन्हें अपने परम मित्र जो इनके मौसा थे को सौंप दिया।

यह वही साल था जब मंगल पांडे ने अंग्रेजो के खिलाफ बगावत की थी। जब यह 16 वर्ष के हुए तो सौभाग्यवश इनकी मुलाकात एक दुभाषिया से हुई जो ब्रिटिश सेना में कार्यरत था। कुछ ही दिनों में ये उनसे इतने प्रभावित हुए कि इन्होंने सरकारी आदमी बनने की ठान ली। मगर उनके व्यक्तित्व से ज्यादा इन्हें उनके कोट पेंट ने प्रभावित किया था। साधु जी ठहरे साधु जी जो ठान ली वो ठान ली, बन बैठे सरकारी आदमी नौकरी क्लर्क की मिली थी, अंग्रेजी दफ्तर में। भत्ता भी अच्छा खासा था। कुछ ही सालों में उन्होंने सारे महकमे में अपनी गहरी पैठ बना ली। एक बार एक बड़े साहब निरीक्षण के लिए इनके महकमे में पधारे, फिर दूसरी बार आएं और हर साल आते गए। कई बार तो साधु जी के काम से वह बड़े प्रभावित हुए और अंत मे इन्हें अपना सेक्रेटरी बना लिया।

जिस दिन इनके काम का पहला दिन था उसी दिन दुर्भाग्यवश स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद जी ने देश के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। यह दफ्तर में बैठे थे,साहब भी आए ये उन्हें कोई कागज दिखा रहे थे। तभी कोई चिल्लाया आजाद जी नहीं रहे साहब धूर्ततापूर्ण मुस्कान लिए बुदबुदाया और बोले और मांगो आजादी सहसा साधु जी चिल्लाते हुए बोले “अब हम आजाद हैं” और लात घूसों की बरसात कर दी साहब पर तभी इनका दफ्तर छूटा और इनकी आजादी भी छूट गई जेल गए सो अलग।

पूरे जिले में इस कांड की चर्चा हो गई, लगा जिले को एक नया क्रांतिकारी मिल गया, हुआ भी वही अब इन पर आजादी की सनक सवार हुई। सनक ऐसी कि साल के आठों माह जेल में ही बिताने लगे। बाकी चार महीने लोगों को जागरुक करने उन पर देश भक्ति का रंग चढ़ाने और जगह-जगह क्रांतिकारी सभाओं को संबोधित करने में बिताने लगे।

जब जब कोई देशव्यापी स्वतंत्रता के लिए आंदोलन हुआ उन्होंने अपने राज्य और जिले में उसकी अगुवाई की। इसी सनक में ये ब्रह्मचारी बन बैठे, प्रण लिया जब तलक आजादी नहीं मिलेगी ब्याह नही करेंगे। सो तभी इन्हें नाम मिला साधु जी फिर बुढ़ापे ने उन्हें जकड़ लिया फिर भी मशवरा लेने वालों की तादाद कभी कम नहीं हुई। फिर आया वह वर्ष जब भारत आजाद होने वाला था, लेकिन जब तक आजाद होता,ये आजाद हो चले थे।

मेरी तरफ से आप सभी को स्वतंत्रता दिवस के लिए हार्दिक शुभकामनाएं।🌄🙏

चलो फ़िर से मुस्कुराएं

चलो फिर से मुस्कुराएं
चलो फिर से दिल जलाएं
जो गुज़र गयी हैं रातें
उन्हें फिर जगा के लाएं
जो बिसर गयी हैं बातें
उन्हें याद में बुलायें
चलो फिर से दिल लगायें
चलो फिर से मुस्कुराएं
किसी शह-नशीं पे झलकी
वो धनक किसी क़बा की
किसी रग में कसमसाई
वो कसक किसी अदा की
कोई हर्फे-बे-मुरव्वत
किसी कुंजे-लब से फूटा
वो छनक के शीशा-ए-दिल
तहे-बाम फिर से टूटा
ये मिलन की, नामिलन की
ये लगन की और जलन की
जो सही हैं वारदातें
जो गुज़र गयी हैं रातें
जो बिसर गयी हैं बातें
कोई इनकी धुन बनाएं
कोई इनका गीत गाएं
चलो फिर से मुस्कुराएं
चलो फिर से दिल लगाएं

फ़ैज़ अहमद

Love wid work

वो लोग बहुत ख़ुशक़िस्मत थे
जो इश्क़ को काम समझते थे
या काम से आशिक़ी करते थे
हम जीते जी मसरूफ़ रहे
कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया

काम इश्क़ के आड़े आता रहा
और इश्क़ से काम उलझता रहा
फिर आख़िर तंग आकर हम ने
दोनों को अधूरा छोड़ दिया

In memory of

Faizz Ahmad faizz 😶

बनाया है मैंने ये घर धीरे धीरे

बनाया है मैंने ये घर धीरे धीरे

खुले मेरे ख्वाबों के पर धीरे-धीरे

किसी को गिराया ना खुद को उछाला

कटा जिंदगी का सफर धीरे धीरे

जहां आप पहुंचे छलांग लगाकर

मैं भी आया मगर धीरे-धीरे

पहाड़ों की कोई चुनौती नहीं थी

उठता गया यूं ही सर धीरे-धीरे

ना हंसकर रोकर किसी में उड़ेला

पिया खुद ही अपना जहर धीरे-धीरे

गिरा मैं कहीं तो अकेले में रोया

गया दर्द से घाव भर धीरे-धीरे

जमीन खेत की साथ लेकर चला था

उगा उसमें कोई शहर धीरे धीरे

मिला क्या ना मुझको यह दुनिया तुम्हारी मोहब्बत मिली मगर धीरे-धीरे.

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ramdasarath mishra

वेदना

खंडित विखंडित एहसास

लहू समन्वय शिथिल ह्रदय, मानस प्रवृत्ति का ह्रास।

हर क्षण नया द्वंद आचरण का अराजक खास।

चाहिए आत्मबोध, अदृश्य मित्र तलक अंतिम श्वास।

खोजता उस गगन को जो करें आनीक तम का नाश,

प्रशस्त करें करुणा-कर है पूरा विश्वास।

कमाल

मेहनत का रंग कमाल है प्यारे

उद्घोष वचनबद्ध कर्म सहारे अमरदीप बन जले सितारे

स्वप्न सलिल छोड़ कर्मठ बन अगन जला रे

मेहनत का रंग कमाल है प्यारे।

बचपन की यादें😍

बचपन की वो यादें जिनमें करता मैं फरियादें

कभी हंसता,कभी रोता,न कम न ज्यादे,

बड़ी याद आती हैं बचपन की वो यादें।

वो मां का प्यार, वो पिता का दुलार, वो भाई की फटकार न कम न ज्यादे ,

बड़ी याद आती है बचपन की वो यादें।

वो बेतुके सवाल हर चीज लगती कमाल करते हुए धमाल धीरे-धीरे बीत गए साल कभी एक कभी आधे,

बड़ी याद आती है बचपन की वो यादें।

😣🙄

©®mak

वतन के नौजवान

ऐ वतन के नौजवान वतन पर मिटने की बारी आई है

दिखा अपना शौर्य और साहस क्यों लेता तू जम्हाई है।

जिस मिट्टी ने पाला तुझे वह देती तुझे दुहाई है

ऐ वतन के नौजवान वतन पर मिटने की बारी आई है।

नैतिक था तू दैविक था तू वतन के वास्ते

लहू पी दानव बन जा हा वतन के वास्ते

है कर्ज असंख्य वीरों का सुरों के शमसिरों का

अब मातृ ऋण चुकाने की बारी आई है।

ऐ वतन के नौजवान वतन पर मिटने की बारी आई है।

Mak ©®

बाकी

हंस रहा हूं मगर मुस्कुराना बाकी है

दर्दे इंतहां की रातों में आंसू आना बाकी है

यह बुद्धू मन तो समझ जाता है मगर इस बेगैरत दिल को समझाना बाकी है।।।

Mak©®

Save water save life

नीड अमृत रंग अजान मधुर संजीवन असि प्राण शीतल स्वप्निल भूजल अद्वैत

Mak ©®

ऋग्वेद

सरस्वती घोरा हिरण्यवर्तनी: |

अर्थात_∆ सरस्वती शत्रुओं के लिए भयंकर है और स्वर्णिम मार्ग पर चलती है।

तल्खी

तल्खी है मगर इश्क बेतहाशा है,

आलम यह आलम यह कि जिंदगी एक तमाशा है

जाएं किधर हर तरफ दिखता है छद्म युद्ध और खिलखिलाती हुई निराशा है।

चलते हुए उनके किनारों पर आंखें अनायास ही शून्य हो जाती हैं।

अगर वह किनारा है तो जिंदगी की मौत में फर्क जरा सा है

सुबह की धूप शबनमें-जन्नत है तो दिल के तूफ़ां में फर्क जरा सा है।

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इंसा तू रोना छोड़ दे

ऐ इंसा अब तू रोना छोड़ दे, मुश्किलों के घुटने तोड़ दे,

डर कर भाग मत हिम्मत दिखा, सब को सिखा अब तू रोना छोड़ दे।

ना किसी से डर और ना किसी को डरा,

नहीं हार और ना हरा, बस अपनी काबिलियत का परचम लहरा, खुल के जी और हंसते जा।

इंसा अब तो रोना छोड़ दे।

अच्छाइयों को देख तू अब बन जा नेक तू,

न झूठ बोलना बोलना सिखा,

सच के साथ जी और जीतेजा बुराइयों को छोड़ दे,

और मुश्किलो तोड़ दे, ऐ इंसान अब तो रोना छोड़ दे। गर ख़ुद पर तुझे है भरोसा तू मौत से टकराएगा उसे दूर छोड़ आएगा।

रोते हुए को हंसा कर दिखाएगा,

दुश्मनों को दोस्त बनाएगा,

नामुमकिन को मुमकिन करते जाएगा,

अब हंस थोड़ा मुस्कुरा मधुर गीत गा और बस तू रोना छोड़ दे।

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रहनुमा ऐ इश्क

रहनुमा है वह इश्क का

या कोई फसाना है

दिल्लगी है शायद

जाने ना जमाना है

लगे तो हीर है चाहे तो रांझा

पा लिया तो daawat-e-ishq वरना सिर्फ तड़पना और मर ही जाना।

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मानस प्रवृत्ति आने लगी है

पतझड़ बहार सावन की फुहार

अब बेगाने हैं।

नाचता हुआ मोर, चहु और उल्लास व शोर सब बेगाने हैं।

क्षैतिज की निराशा अब जा चुकी है,

है विडंबना मिट चुकी है लालसा क्षणिक कुटुम्ब और वैभव की,

आहट मानस प्रवृत्ति की सुनी है।

लिए परम आनंद की अनुभूति शीतल भाव हृदय को छूती सारी दुविधा सुलझाने लगी है,

मानस प्रवृत्ति प्रकृति में अब आने लगी है।

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mak

इश्क़ मुजाहिद्दीन

ये इश्क़ मुजाहिद्दीन है,

जिसकी हर शाम रंगीन है।

इसको कोई कमी ना है,

क्योंकि ये बहोत कमीना है।

इसकी सांसे महजबीन है,

अश्को से दिल को तोड़ दे, ये इतनी हसीन है।

ये इश्क़ मुजाहिद्दीन है।

ख्वाबो के गलियारों में,

जो नहीं छोड़ता जमीन है।

जिसकी डूबती हुई सांसे कहती आमीन है,

ह ये वही इश्क़ मुजाहिद्दीन है।

😍Mak©®

Ghazal

शायद आगाज हुआ है फिर किसी अफ़साने का

हुक्म आदम को है जन्नत से निकल जाने का

उन से कुछ कह तो रहा हु मगर अल्लाह ने करे

वो भी महफ़ूम न समझे मेरे अफ़साने का

देखने की ये हज़रत-ऐ-वाइज न हो

रास्ता पूछ रहा कोई मैखाने का

बेताल्लुक तेरे आगे से गुजर जाता हूं

यह भी एक हुस्न ए तलब है तेरे दीवाने का

हश्र तक गर्मी ए हंगामा ए हस्ती है शकील

सिलसिला ख़त्म न होगा मेरे अफसाने का

By a legend

शकील बदायूनी

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