बनाया है मैंने ये घर धीरे धीरे

बनाया है मैंने ये घर धीरे धीरे खुले मेरे ख्वाबों के पर धीरे-धीरे किसी को गिराया ना खुद को उछाला कटा जिंदगी का सफर धीरे धीरे जहां आप पहुंचे छलांग लगाकर मैं भी आया मगर धीरे-धीरे पहाड़ों की कोई चुनौती नहीं थी उठता गया यूं ही सर धीरे-धीरे ना हंसकर रोकर किसी में उड़ेला पिया…

वेदना

खंडित विखंडित एहसास लहू समन्वय शिथिल ह्रदय, मानस प्रवृत्ति का ह्रास। हर क्षण नया द्वंद आचरण का अराजक खास। चाहिए आत्मबोध, अदृश्य मित्र तलक अंतिम श्वास। खोजता उस गगन को जो करें आनीक तम का नाश, प्रशस्त करें करुणा-कर है पूरा विश्वास।

कमाल

मेहनत का रंग कमाल है प्यारे उद्घोष वचनबद्ध कर्म सहारे अमरदीप बन जले सितारे स्वप्न सलिल छोड़ कर्मठ बन अगन जला रे मेहनत का रंग कमाल है प्यारे।

बचपन की यादें😍

बचपन की वो यादें जिनमें करता मैं फरियादें कभी हंसता,कभी रोता,न कम न ज्यादे, बड़ी याद आती हैं बचपन की वो यादें। वो मां का प्यार, वो पिता का दुलार, वो भाई की फटकार न कम न ज्यादे , बड़ी याद आती है बचपन की वो यादें। वो बेतुके सवाल हर चीज लगती कमाल करते…

वतन के नौजवान

ऐ वतन के नौजवान वतन पर मिटने की बारी आई है दिखा अपना शौर्य और साहस क्यों लेता तू जम्हाई है। जिस मिट्टी ने पाला तुझे वह देती तुझे दुहाई है ऐ वतन के नौजवान वतन पर मिटने की बारी आई है। नैतिक था तू दैविक था तू वतन के वास्ते लहू पी दानव बन…

बाकी

हंस रहा हूं मगर मुस्कुराना बाकी है दर्दे इंतहां की रातों में आंसू आना बाकी है यह बुद्धू मन तो समझ जाता है मगर इस बेगैरत दिल को समझाना बाकी है।।। Mak©®

Save water save life

नीड अमृत रंग अजान मधुर संजीवन असि प्राण शीतल स्वप्निल भूजल अद्वैत Mak ©®

ऋग्वेद

सरस्वती घोरा हिरण्यवर्तनी: | अर्थात_∆ सरस्वती शत्रुओं के लिए भयंकर है और स्वर्णिम मार्ग पर चलती है।

तल्खी

तल्खी है मगर इश्क बेतहाशा है, आलम यह आलम यह कि जिंदगी एक तमाशा है जाएं किधर हर तरफ दिखता है छद्म युद्ध और खिलखिलाती हुई निराशा है। चलते हुए उनके किनारों पर आंखें अनायास ही शून्य हो जाती हैं। अगर वह किनारा है तो जिंदगी की मौत में फर्क जरा सा है सुबह की…

इंसा तू रोना छोड़ दे

ऐ इंसा अब तू रोना छोड़ दे, मुश्किलों के घुटने तोड़ दे, डर कर भाग मत हिम्मत दिखा, सब को सिखा अब तू रोना छोड़ दे। ना किसी से डर और ना किसी को डरा, नहीं हार और ना हरा, बस अपनी काबिलियत का परचम लहरा, खुल के जी और हंसते जा। इंसा अब तो…

रहनुमा ऐ इश्क

रहनुमा है वह इश्क का या कोई फसाना है दिल्लगी है शायद जाने ना जमाना है लगे तो हीर है चाहे तो रांझा पा लिया तो daawat-e-ishq वरना सिर्फ तड़पना और मर ही जाना। Mak©®

मानस प्रवृत्ति आने लगी है

पतझड़ बहार सावन की फुहार अब बेगाने हैं। नाचता हुआ मोर, चहु और उल्लास व शोर सब बेगाने हैं। क्षैतिज की निराशा अब जा चुकी है, है विडंबना मिट चुकी है लालसा क्षणिक कुटुम्ब और वैभव की, आहट मानस प्रवृत्ति की सुनी है। लिए परम आनंद की अनुभूति शीतल भाव हृदय को छूती सारी दुविधा…

इश्क़ मुजाहिद्दीन

ये इश्क़ मुजाहिद्दीन है, जिसकी हर शाम रंगीन है। इसको कोई कमी ना है, क्योंकि ये बहोत कमीना है। इसकी सांसे महजबीन है, अश्को से दिल को तोड़ दे, ये इतनी हसीन है। ये इश्क़ मुजाहिद्दीन है। ख्वाबो के गलियारों में, जो नहीं छोड़ता जमीन है। जिसकी डूबती हुई सांसे कहती आमीन है, ह ये…

Ghazal

शायद आगाज हुआ है फिर किसी अफ़साने का हुक्म आदम को है जन्नत से निकल जाने का उन से कुछ कह तो रहा हु मगर अल्लाह ने करे वो भी महफ़ूम न समझे मेरे अफ़साने का देखने की ये हज़रत-ऐ-वाइज न हो रास्ता पूछ रहा कोई मैखाने का बेताल्लुक तेरे आगे से गुजर जाता हूं…

दिल्लगी दीवाने की

दिल्लगी दीवाने से बेहतर है कौन समझे उलझी है उसकी यादे, उसकी महरूम यादों को कौन समझे दिल के अंधेरों में उसकी तलाश जारी रहती है मगर दर्द दिले बेगैरत और उसकी ग़ुरबत को कौन समझे जीता है वह इस कशमकश में आशिक अजीब है उन काली स्याह रातों में उसकी तड़पन को कौन समझे…